बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

मेरी पोस्ट (आपका ब्लॉग एबीपी न्यूज़ में )

प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि  मेरी पोस्ट  एबीपी न्यूज़, अक्टूबर २०१३ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .

मेरी पोस्ट (आपका ब्लॉग एबीपी न्यूज़ में )


http://aapkablog.abpnews.newsbullet.in/life-style/2013/10/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%81%E0%A4%A7-%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%BE-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5





 परम्पराओं का पालन या अँध बिश्बास का खेल
(करबा चौथ )
करवाचौथ के दिन
भारतबर्ष में सुहागिनें
अपने पति की लम्बी उम्र के लिए
चाँद दिखने तक निर्जला उपबास रखती है .
पति पत्नी का रिश्ता समस्त
इस धरती पर सबसे जरुरी और पवित्र रिश्ता है
आज के इस दौर में जब सब लोग
एक दुसरे की जान लेने पर तुलें हुयें हों
तो आजकल पत्नी का पति के लिए उपवास रखना
किसी अजूबे से कम नहीं हैं।
कहाबत है कि करवा चौथ का व्रत रखने से
पति की आयु बढती है और प्यार भी
तो क्या जिनके खानदान में ये परंपरा है
क्या वहां कोई विधवा नहीं होती
और वहां कभी कोई तलाक नहीं हुआ
अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यूं ये दिखावा
ऐसें भी दम्पति हैं सारे साल लड़ते झगड़ते है
और फिर ये दिखावा करते है
क्या जो महिलाये ये व्रत नहीं रखती
वो अपने पति से प्यार नहीं करती
क्या उनके मन में
अपने पति की उम्र की लम्बी कामना नहीं होती
क्या वे विधवा हो जाती है
नहीं ऐसा कुछ नहीं होता
हम सब ये सब जानते हैं
फिर भी ये परंपरा निभाते चले जाते है
ये अंधविश्वास नहीं तो और क्या है
आज जरुरत है पुराने अंधविश्वास को छोड़कर
नयी मान्यताओ को लेकर आगे बढना
जिसका कोई ठोस मकसद हो
वेसे भी क्या एक दिन ही काफी है
पति के लम्बी उम्र की कामना के लिए
बाकी के दिन नहीं
अगर हर रोज ये कामना करनी हैं
फिर ये करवा चौथ क्यों ?
आज के समय में
जरुरत है कि
नयी परम्पराओं को जन्म देकर
आपसी रिश्ता
कैसे मजबूत कर सकें
परस्पर मिलकर खोज करने की।
मेरी पत्नी को समर्पित एक कबिता :
*******************************************************


अर्पण आज तुमको हैं जीवन भर की सब खुशियाँ
पल भर भी न तुम हमसे जीवन में जुदा होना
रहना तुम सदा मेरे दिल में दिल में ही खुदा बनकर
ना हमसे दूर जाना तुम और ना हमसे खफा होना
अपनी तो तमन्ना है सदा हर पल ही मुस्काओ
सदा तुम पास हो मेरे ,ना हमसे दूर हो पाओ
तुम्हारे साथ जीना है तुम्हारें साथ मरना है
तुम्हारा साथ काफी हैं बाकी फिर क्या करना है
अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बह सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी खता होगी


मेरी पोस्ट (आपका ब्लॉग एबीपी न्यूज़ में )

मदन मोहन सक्सेना

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

प्यार की ख्वाहिश





















प्यार की ख्वाहिश



गर कोई हमसे कहे की रूप कैसा है खुदा का
हम यकीकन ये कहेंगे जिस तरह से यार है


संग गुजरे कुछ लम्हों की हो नहीं सकती है कीमत
गर तनहा होकर जीए तो बर्ष सो बेकार है


सोचते है जब कभी हम क्या मिला क्या खो गया
दिल जिगर साँसें हैं  अपनी पर न कुछ अधिकार है

याद कर सूरत सलोनी खुश हुआ करते हैं  हम
प्यार से बह  दर्द दे दें  तो हमें  स्वीकार है

जिस जगह पर पग धरा है उस जगह खुशबु मिली है
अब नाम लेने से ही अपनी जिंदगी गुलजार है

ये ख्वाहिश अपने दिल की है की कुछ नहीं अपना रहे
क्या मदन इसको ही कहते लोग अक्सर प्यार है





मदन मोहन सक्सेना

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

मुश्किल समय




  














मुश्किल समय :



उसे हम दोस्त क्या मानें  दिखे मुश्किल में मुश्किल से
मुसीबत में भी अपना हो उसी को दोस्त मानेगें

जो दिल को तोड़ ही डाले उसे हम प्यार क्या जानें
दिल से दिल मिलाये जो उसी को प्यार जानेंगें



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बाप बेटा  माँ या बेटी  स्वार्थ के रिश्ते सभी से
उम्र के अंतिम सफ़र में अपना नहीं कोई दोस्तों

स्वप्न थे सबके दिलों में अपना प्यार हो परिबार हो
स्वार्थ लिप्सा देखकर अब सपना नहीं कोई दोस्तों


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अपने  और गैरों में फर्क करना नहीं यारों
मर्जी क्या खुदा की हो अपने कौन हो जाएँ

जिसे पाला जिसे पोषा अगर बन जायें बह कातिल
हंसी जीवन गुजरने के  सपनें मौन हो जाएँ


प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ८, अक्टूबर २०१३ में

प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ८, अक्टूबर २०१३ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .

आगमन नए दौर का आप जिसको कह रहे
बह सेक्स की रंगीनियों की पैर में जंजीर है

खून से खेली है होली आज के इस दौर में
कह रहे सब आज ये नहीं मिल रहा अब नीर है

मौत के साये में जीती चार पल की जिन्दगी
ये ब्यथा अपनी नहीं हर एक की ये पीर है

सुन चुके है बहुत किस्से वीरता पुरुषार्थ के
रोज फिर किसी द्रौपदी का खिंच रहा क्यों चीर है

इन्सान कि इंसानियत के गीत अब मत गाइए
हमको हमेशा स्वार्थ की मिलती रही तामीर है

आज के हालत में किस किस से हम बचकर चले
प्रश्न लगता है सरल पर ये बहुत गंभीर है

ब्याकुल हुआ है मदन अब आज के हालत से
आज अपनी लेखनी बनती न क्यों शमशीर है

 


मदन मोहन सक्सेना




रविवार, 29 सितंबर 2013

मेरी पोस्ट (जागरण जंक्शन फोरम सोशल मीडिया ) में




























प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी पोस्ट (जागरण जंक्शन फोरम सोशल मीडिया )  को जागरण जंक्शन में शामिल किया गया है .


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सोशल मीडिया
सोशल मीडिया पर गैर जुम्मेदारी का आरोप लगाकर उसे नियंत्रित करने का सरकार का इरादा वह भी सभी राजनैतिक दलों के सहयोग से बहुत सराहनीय नहीं कहा जा सकता| हाँ जो लेखक गैर जुम्मेदार हैं उन्हें जुम्मेदारी का अहसास सामाजिक जीवन में सीखना ही होगा यही लोकतंत्र की संवैधानिक अपेक्षा है|

सम्प्रति सरकार की इस पहल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के द्वारा हाँ में हाँ मिलाना बड़ा आश्चर्यजनक लगता है, जहाँ अधिकांश समाचार अर्ध सत्य भ्रामक तथा राजनैतिक दलों एवं चैनल्स समूह के स्वामियों के हित पोषण हेतु प्रसारित किये जाते हैं| जिन विषयों पर वहाँ परिचर्चा आयोजित होती है उसके कतिपय सहभागी तो जाति धर्म क्षेत्र और रूढिग्रस्त पूर्वाग्रहों से ग्रसित रहते हैं, और लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक सोच से रिक्त होते हैं, फिर भी उनके हास्यास्पद विचार जनता सुनती है| इन परिचर्चाओं में भाषा की अश्लीलता आये दिन प्रदर्शित होती रहती है| यही नहीं कभी-कभी चैनल्स के सम्पादकीय विभाग की समझ और योग्यता उपहासजनक लगती है दो-चार शब्दों के केपशन तक गलत और अशुद्ध प्रसारित किये जाते हैं|

फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नियंत्रण की बात लोकतांत्रिक समाज को शोभा नहीं देती। लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोशल नेटवर्क सबसे ज्यादा उपयोगी साबित होता है। जहां तक महिलाओं का मसला है तो ऐसी साइटों के माध्यम से वह अपने अधिकारों से संबंधित जानकारियां हासिल कर सकती हैं, अपनी बात अन्य लोगों को बता सकती हैं। वहीं दूसरी ओर इन सभी साइटों की ही वजह से आमजन अपने आसपास घट रही घटनाओं से परिचित होकर उन पर अपनी टिप्पणी कर सकते हैं, उनसे जुड़े पक्षों से अवगत हो सकते है। साथ ही सरकारी क्रियाकलापों और योजनाओं की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। इस वर्ग में शामिल लोग यह भी स्वीकार करते हैं कि हालांकि कुछ शरारती तत्व ऐसे हैं जो शांति व्यवस्था को आहत करने के लिए इन सोशल नेटवर्किंग साइटों का प्रयोग करते हैं लेकिन कुछ चुनिंदा लोगों की वजह से सोशल नेटवर्किंग को नियंत्रित करना सही नहीं है क्योंकि ये वो लोग हैं जो कोई ना कोई माध्यम ढूंढ़कर अपना मकसद पूरा कर ही लेंगे।

प्रिंट मीडिया के कतिपय लेख अवश्य ही विचारणीय होते हैं लेकिन उन्हें भी इतना समझना चाहिये कि उनके कितने समाचार निष्पक्षता के प्रमाण माने जा सकते हैं? क्या विज्ञापन के मोह में उनका लेखकीय दायित्व प्रभावित नहीं होता है? क्या पेड़ न्यूज़ नहीं प्रसरित की जाती हैं जबकि सोशल मीडिया के लेखक केवल राष्ट्र और समाज के हित में निष्पृह लिखते हैं और उसमे भी असहमति के लिए पूरी सम्भावना रहती है| बहस होती है और किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की हर संभव कोशिश की जाती है|
मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बुलाई गई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए सोशल मीडिया को आड़े हाथों लिया। उनका कहना था कि सोशल मीडिया का जिस तरह प्रयोग होना चाहिए वैसे नहीं हो पा रहा है। प्रधानमंत्री का कहना था कि युवाओं के लिए सोशल नेटवर्किंग साइटें जानकारियां प्राप्त करने और उन्हें साझा करने का अच्छा माध्यम साबित हो सकती हैं लेकिन इसका प्रयोग इस दिशा में नहीं हो पा रहा है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उठी यह चर्चा कोई आज की बात नहीं है हर बार यही देखा जाता है कि जब भी कोई घटना घटित होती है तो उससे संबंधित चर्चाएं फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आम होने लगती हैं। दिल्ली गैंग रेप केस हो या फिर मुजफ्फरनगर में हुए दंगे, हर बार यही देखा जाता है कि कई बार सोशल नेटवर्किंग साइटों पर डाली गई जानकारियां व्यवस्थित माहौल को बिगाड़ने लगती हैं और समाज में एक अजीब से तनाव को जन्म दे देती हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव दो ऐसे मुद्दे हैं जिस पर सोशल नेटवर्किंग साइटों पर होने वाली पोस्ट सबसे ज्यादा प्रभाव डालती हैं। हमारा समाज बहुत संवेदनशील है और कोई भी नकारात्मक या भ्रामक जानकारी समाज के लिए खतरा पैदा कर सकती है। ऐसे हालातों के मद्देनजर सोशल नेटविंग साइटों पर नियंत्रण और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी उनकी भूमिका को लेकर एक बहस शुरू हो गई है।

वर्तमान में सोशल मीडिया जनता की आवाज़ है और ऐसी आवाज़ है जो सत्ता शासन तथा प्रशासन के कानो तक न केवल पहुँच रही है अपितु उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित और मजबूर करती है कदाचित यह आवाज़ उनकी निरंकुशता को आहत करती है इसलिए इसके विरुद्ध उनकी एकजुटता दिख रही है अन्यथा उनमे जितना दुराव हैं उतना न तो समाज में हैं और न राष्ट्रीय जीवन के किसी अंग में, तथापि सोशल मीडिया के कुछ राजनैतिक सोच से दबे हुए लेखकों को अपने अंदर सुधार अपेक्षित है इसे भी नहीं नकारा जा सकता| अनियंत्रित सोशल मीडिया शांति व्यवस्था के लिए किस प्रकार खतरा नहीं हो सकती है. सोशल मीडिया का उपयोग महिलाओं की सुरक्षा और उनकी अस्मिता के लिए खतरा नहीं है. नियंत्रित सोशल मीडिया लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत के खिलाफ नहीं है. अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की निजता का हनन सही नहीं है.



मदन मोहन सक्सेना

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

खुद से मिलन



























आँख से अब नहीं दिख रहा है जहाँ ,आज क्या हो रहा है मेरे संग यहाँ
माँ का रोना नहीं अब मैं सुन पा रहा ,कान मेरे ये दोनों क्यों बहरें हुए.

उम्र भर जिसको अपना मैं कहता रहा ,दूर जानो को बह मुझसे बहता रहा.
आग होती है क्या आज मालूम चला,जल रहा हूँ मैं चुपचाप ठहरे हुए.

शाम ज्यों धीरे धीरे सी ढलने लगी, छोंड तनहा मुझे भीड़ चलने लगी.
अब तो तन है धुंआ और मन है धुंआ ,आज बदल धुएँ के क्यों गहरे हुए..

ज्यों जिस्म का पूरा जलना हुआ,उस समय खुद से फिर मेरा मिलना हुआ
एक मुद्दत हुयी मुझको कैदी बने,मैनें जाना नहीं कब से पहरें हुए.


मदन मोहन सक्सेना

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

तिल का ताड़


 
नेता क्या अभिनेता क्या अफसर हो या ब्यापारी 
पग धरते ही जेल के अन्दर सब के सब बीमार हुए 

कैसा दौर चला है यारों गंदी कैसी राजनीती है
अमन चैन से रहने बाले दंगे से दो चार हुए 


दादी को नहीं दबा मिली मुन्ने का भी दूध खत्म
कर्फ्यू में मौका परस्त को लाखों के ब्यापार हुए 


तिल का ताड़ बना डाला क्यों आज सियासतदारों ने
आज बापू तेरे देश में कैसे ,कैसे अत्याचार हुए


हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई
ख्बाजा साईं के घर में ये कहना क्यों बेकार हुए

 





प्रस्तुति
मदन मोहन सक्सेना

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

आँख मिचौली जागरण जंक्शन में


प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि  मेरी पोस्ट आँख मिचौली को जागरण जंक्शन में शामिल किया गया है। 

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आँख मिचौली


जब से मैंने गाँव क्या छोड़ा
शहर में ठिकाना खोजा
पता नहीं आजकल
हर कोई मुझसे
आँख मिचौली का खेल क्यों खेला करता है
जिसकी जब जरुरत होती है
बह बहाँ से गायब मिलता है
और जब जिसे जहाँ नहीं होना चाहियें
जबरदस्ती कब्ज़ा जमा लेता है
कल की ही बात है
मेरी बहुत दिनों के बात उससे मुलाकात हुयी
सोचा गिले शिक्बे दूर कर लूँ
पहले गाँव में तो उससे रोज का मिलना जुलना होता था
जबसे मुंबई में इधर क्या आया
या कहिये
मुंबई जैसेबड़े शहरों की दीबारों के बीच आकर फँस गया
पूछा
क्या बात है
आजकल आती नहीं हो इधर।
पहले तो हमारे आंगन भर-भर आती थी
दादी की तरह छत पर पसरी रहती थी हमेशा
तंग दिल पड़ोसियों ने
अपनी इमारतों की दीवार क्या ऊँची की
तुम तो इधर का रास्ता ही भूल गयी
तुम्हें अक्सर सुबह देखता हूं
कि पड़ी रहती हो
तंगदिल और धनी लोगों
के छज्जों पर
हमारी छत तो
अब तुम्हें भाती ही नहीं है
क्या करें
बहुत मुश्किल होती है
जब कोई अपना (बर्षों से परिचित)
आपको आपके हालत पर छोड़कर
चला जाता है
लेकिन याद रखो
ऊँची इमारतों के ऊँचे लोग
बड़ी सादगी से लूटते हैं
फिर चाहे वो दौलत हो या इज्जत हो
महीनों के बाद मिली हो
इसलिए सारी शिकायतें सुना डाली
उसने कुछ बोला नहीं
बस हवा में खुशबु घोल कर
खिड़की के पीछे चली गई
सोचा कि उसे पकड़कर आगोश में भर लूँ
धत्त तेरी की
फिर गायब
ये महानगर की धूप भी न
बिलकुल तुम पर गई है
हमेशा आँख मिचौली का खेल खेला करती है
बिना ये जाने
कि इस समय इस का मौका है भी या नहीं …

मदन मोहन सक्सेना






सोमवार, 26 अगस्त 2013

कृष्ण जन्म अष्टमी पर बिशेष ( अर्थ का अनर्थ )



अब तो आ कान्हा  जाओ, इस धरती पर सब त्रस्त हुए 
दुःख सहने को भक्त तुम्हारे आज सभी अभिशप्त हुए
नन्द दुलारे कृष्ण कन्हैया  ,अब भक्त पुकारे आ जाओ 
प्रभु दुष्टों का संहार करो और  प्यार सिखाने आ जाओ 











अर्थ का अनर्थ
 
एक रोज हम यूँ ही बृन्दावन गये
भगबान कृष्ण हमें बहां मिल गये
भगवान बोले ,बेटा मदन क्या हाल है ?
हमने कहा दुआ है ,सब मालामाल हैं

कुछ देर बाद हमने ,एक सवाल कर दिया
भगवान बोले तुमने तो बबाल कर दिया
सवाल सुन करके बो कुछ लगे सोचने
मालूम चला ,लगे कुछ बह खोजने

हमने उनसे कहा ,ऐसा तुमने क्या किया ?
जिसकी बजह से इतना नाम कर लिया
कल तुमने जो किया था ,बह ही आज हम कर रहे
फिर क्यों लोग , हममें तुममें भेद कर रहे

भगवान बोले प्रेम ,कर्म का उपदेश दिया हमनें
युद्ध में भी अर्जुन को सन्देश दिया हमनें
जब कभी अपनों ने हमें दिल से है पुकारा
हर मदद की उनकी ,दुष्टों को भी संहारा

मैनें उनसे कहा सुनिए ,हम कैसे काम करते है
करता काम कोई है ,हम अपना नाम करते हैं
देखकर के दूसरों की माँ बहनों को ,हम अपना बनाने की सोचा करते
इसी दिशा में सदा कर्म किया है,  कल क्या होगा  ,ये ना सोचा करते

माता पिता मित्र सखा आये कोई भी
किसी भी तरह हम डराया करते
साम दाम दण्डं भेद किसी भी तरह
रूठने से उनको मनाया करते

बात जब फिर भी नहीं है बनती
कर्म कुछ ज्यादा हम किया करतें
सजा दुष्टों को हरदम मिलती रहे
ये सोचकर कष्ट हम दिया करते 

मार काट लूट पाट हत्या राहजनी
अपनें हैं जो ,मर्जी हो बो करें
कहना तो अपना सदा से ये है
पुलिस के दंडें से फिर क्यों डरे

धोखे से जब कभी बे पकड़े गए
पल भर में ही उनको छुटाया करते
जब अपनें है बे फिर कष्ट क्यों हो
पल भर में ही कष्ट हम मिटाया करते

ये सुनकर के भगबान कहने लगे
क्या लोग दुनियां में इतना सहने लगे
बेटा तुने तो अर्थ का अनर्थ कर दिया
ऐसे कर्मों से जीवन अपना ब्यर्थ कर दिया 

तुमसे कह रहा हूँ मैं हे पापी मदन
पाप अच्छे कर्मों से तुमको डिगाया करेंगें
दुष्कर्मों के कारण हे पापी मदन
हम तुम जैसों को फिर से मिटाया करेंगें 



मदन मोहन सक्सेना