मंगलवार, 2 जुलाई 2013

शून्यता

 





















जिसे चाहा उसे छीना , जो पाया है सहेजा है
उम्र बीती है लेने में ,मगर फिर शून्यता क्यों हैं


सभी पाने को आतुर हैं , नहीं कोई चाहता देना
देने में ख़ुशी जो है, कोई बिरला  सीखता क्यों है 


कहने को तो , आँखों से नजर आता सभी को है
अक्सर प्यार में ,मन से मुझे फिर दीखता क्यों है


दिल भी यार पागल है ,ना जाने दीन दुनिया को
दिल से दिल की बातों पर आखिर रीझता क्यों है


आबाजों की महफ़िल में दिल की कौन सुनता है
सही चुपचाप  रहता है और झूठा चीखता क्यों है



मदन मोहन सक्सेना


11 टिप्‍पणियां:

  1. देने में जो ख़ुशी है उसे बिरला ही सीखता क्यों.... बहुत अच्छी रचना !!

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  2. बिलकुल सही कहा आपने, बहुत सुंदर और उम्दा गजल, आभार



    यहाँ भी पधारे ,http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_1.html

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  3. आबाजों की महफ़िल में दिल की कौन सुनता है
    सही चुपचाप रहता है और झूठा चीखता क्यों है

    ...बिल्कुल सच..बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  4. उम्र बीती है लेने में ,मगर फिर शून्यता क्यों हैं ?

    बेहद सुंदर अभिव्यक्ति ..

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  5. उम्र बीती है लेने में ,मगर फिर शून्यता क्यों हैं

    bahut khoobsurat bhaav

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